भारत में नए मोड़ पर किसान आंदोलन

कृषि कानून का सख्त विरोध

० देश के 86 फीसदी छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति ऐसी नहीं है कि वो अपनी फसल को कही बाहर जाकर बेच सकें



प्रमुख संवाददाता

वाराणसी। किसानों को चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत अब तक याद हैं। ये पश्चिमी प्रदेश में एक बड़े किसान नेता के रूप में उभरे और साल 1988 और 1989 के बीच अपने आंदोलनों से राजीव गांधी सरकार को झकझोर कर रखा दिया था। कुछ ऐसी ही स्थिति पंजाब के किसानों ने पैदा की है। अंतर फकत इतना है कि अबकी टिकैत सरीखा चेहरा नहीं, पर सामूहिक ताकत किसान आंदोलन को परवान चढ़ा रही है। इस आंदोलन में आम किसान शामिल है और देश भर के किसान इनके साथ कदमताल करने के लिए तैयार हैं।

मोदी सरकार अब से पहले कभी नहीं हिली थी, लेकिन किसानों ने अपने आंदोलन से उसे हिला दिया है। सत्ता समर्थकों जिस तरह से किसानों के खिलाफ अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं, उससे किसानों का तेवर तीखा होता जा रहा है। हालत यह है कि केंद्र सरकार का रुख नरम पड़ता जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी मान रहे हैं कि ये किसानों का आंदोलन है। किसानों को मानने के लिए सरकार हर नुक्सा अपना रही है, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। सरकार की किसानों के प्रति उदासीनता और दंभ टूटता नजर आ रहा है। 27 जनवरी 1988 में मेरठ कमिश्नरी का किसानों ने घेराव किया था। करीब पच्चीस दिनों तक चले इस आंदोलन ने टिकैत को महात्मा का खिताब दे दिया था। इस आंदोलन के बाद उत्तर भारत के किसानों में जागरूकता का संचार हुआ। दो अक्टूबर 1989 के दौरान बोट क्लब पर विशाल किसान रैली की धमक देश भर में पहुंची थी। इसी आंदोलन ने राजीव सरकार के विदाई का बड़ा खाका तैयार किया था। अबकी किसान आंदोलन पंजाब और हरियाणा से शुरू हुआ है। यूपी के मुकाबले दोनों राज्यों के किसान संपन्न माने जाते हैं। किसानों ने जिन तीन कृषि कानूनों की वापसी के लिए जो समझदारी दिखाई है, उसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है।



देश का सबसे पुराना किसान संगठन है अवध किसान सभा। इसके सौ साल पूरे हो चुके हैं। नेहरू जी के नेतृत्व में इसकी स्थापना हुई थी। अवध किसान सभा को बाबा रामचंद्र की छवि और सहदेव सिंह और झींगुरी सिंह की संगठन क्षमता ने अनूठी ताकत दी और उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था। कोरोना संकट के दौर में संसद में बगैर चर्चा एनडीए सरकार ने किसानों पर तीन कानून थोप दिया। ऐसे में पहले से परेशान हाल किसानों के मन में संदेह का बीज उपजना लाजमी है। आज जो मांग किसान कर रहे हैं, वो विपक्षी दल संसद में उठा चुके हैं। खास बात यह है कि केंद्र ने कानून लागू करने से पहले राज्यों से भी संवाद स्थापित करने की जरूरत नहीं समझी।

आंदोलनकारी किसान चाहते हैं कि एमएसपी पर खरीद की बाध्यता को इस कानून में जोड़ा जाए। साथ ही मंडियों का अस्तित्व मिटने से बचाया जाए। जमाखोरी को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए जाएं।



कोरोना की आड़ में कृषि उत्पादों की जमाखोरी करके मुनाफाखोरों ने किसानों और उपभोक्ताओं काफी प्रभावित किया। मुनाफाखोरों पर अंकुश लगाने में सरकार नाकाम रही। उलटे आक्रामक होकर विपक्षी दलों को बिचौलियों का प्रतिनिधि बनाकर पेश करने के लिए सुनियोजित ढंग से मुहिम चलाई गई। तब केंद्र के खिलाफ स्वर मुखरित हुए और किसानों ने दिल्ली की ओर कूच किया। केंद्र सरकार ने बातचीत करने के बजाए उनकी राह में अड़चने डालने की कोशिश की। हाल यह है कि अब आंदोलन का दायरा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र समेत कई इलाकों में फैल गया है। किसानों की बगावत रंग ला रही है।

किसानों की नई पीढ़ी शिक्षित है और वो अपना जानती है। कर्ज माफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य की किसानों की डिमांड पुरानी है।



दिल्ली में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति का गठन किया गया है। इसमें पांच कार्यक्रम तय किए गए हैं, जिसका पहला बिंदु एमएसपी को लाभकारी बनाना है। हाल के सालों में किसानों को एक बड़ी राहत यूपीए शासन के दौरान 2008-09 में 72,000 करोड़ रुपये की कर्जमाफी के रूप में मिली थी। कृषि जोतों के हिसाब से 14 करोड़ 65 लाख में से करीब 11 करोड़ किसानों को सालाना 6 हजार रुपये किसान सम्मान निधि के रूप में दिया जा रहा है, लेकिन खाद-बीज, कीटनाशक दवाओं और ट्रैक्टर पर जीएसटी और पेट्रोल-डीजल के दामों के बढ़ने से किसानों की लागत बहुत अधिक बढ़ गई है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र के किसान परेशान हैं। महज एक बार की कर्जमाफी से किसानों के दिन नहीं फिरने वाले।

संभलने वाली नही है। आज खेती बाड़ी के कई संकट है। केवल कृषि पर आधारित परिवार गांव में संकट में हैं क्योंकि उन पर कई तरह के दबाव हैं। गांवों में प्रति व्यक्ति भूमि स्वामित्व में लगातार कमी आती जा रही है। छोटे-छोटे खेतों की उत्पादकता कम है और घाटे की खेती करना लाखों छोटे किसानों की नियति बन गयी है। किसान सम्मान निधि के बाद भी वे समय पर बीज खाद आदि हासिल करने की स्थिति में नहीं होते। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और पंजाब जैसे राज्य में उपज स्थिर हो गयी है। भारत सरकार ने साल 1985-86 में जो कृषि नीति बनायी थी, उसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद को संवैधानिक जिम्मेदारी माना गया। लेकिन बात सीमित दायरे में गेहूं और धान से आगे नाममात्र की बढ़ सकी है। एमएसपी से किसानों को कुछ गारंटी मिली लेकिन जो फसलें इसके दायरे में नहीं वे सबसे अधिक अनिश्चितता की शिकार है। देश के उन 86 फीसदी किसानों के सामने सबसे अधिक संकट है जिनकी पहुंच मंडियों तक है ही नहीं न ही एमएसपी तक। लेकिन इस तस्वीर के बावजूद कम औसत उत्पादकता के बाद भी चीन के बाद भारत सबसे बड़ा फल औऱ सब्जी उत्पादक बन गया है। चीन और अमेरिका के बाद यह सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक देश हो गया है। लेकिन किसान संगठनों की लंबे समय से चली आ रही इस मांग की सभी दलों ने अनसुनी की कि 1969 को आधार वर्ष मानते हुए फसलों का दाम तय हो। इस आन्दोलन में सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में महिलाएं भी हुईं शामिल।



बाद में 1990 में वीपी सिंह सरकार ने सीएच हनुमंतप्पा कमेटी बनायी। यूपीए सरकार ने स्वामीनाथन की अध्य़क्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग बनाया लेकिन अहम सिफारिशें जिस भाव से की गयी थीं वे जमीन पर उस रूप में नहीं उतरीं। कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिश पर भारत सरकार रबी और खरीफ की जिन दो दर्जन फसलों की एमएसपी घोषित करती है, उनके बारे में सरकारी दावा यह है कि इसके तहत कवर की गयी फसलों का योगदान करीब साठ फीसदी है। शेष 40 फीसदी फसलों में दूसरे जिंस और बागवानी उत्पादन हैं, उनको कोई पूछने वाला नही है। जब एमएसपी की फसलें बदहाल हैं तो जो इसके दायरे से बाहर हैं उनकी दशा समझी जा सकती है। सिंचित और असिंचित इलाकों के किसानो के संकट अलग अलग हैं। आज भी हमारा करीब साठ फीसदी इलाका मानसून पर निर्भर है। लेकिन यह कुल खाद्य उत्पादन में 40 फीसदी योगदान दे रहा है।


 

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