सत्कर्म करने के लिए किसी विशेष मुर्हूत की आवश्यकता नहीं - संपत कुमाराचार्य स्वामी जी महाराज



जनसंदेश न्यूज़

वाराणसी। मदरवा लंका वाराणसी में स्थित श्री वैष्णो मठ में आज श्रीमद जगद्गुरु संपत कुमाराचार्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि भागवत परमात्मा का प्रत्यक्ष नामस्वरूप हैं जो भगवान सें संबंध जोड़ देता है। दशम स्कंध तो भागवत का ह्रदय है ।मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य रासलीला। ईश्वर को प्राप्त किए बिना जीव को शांति मिल नहीं पाएगी। जिव ईश्वर के साथ एक हुआ नहीं कि मुफ्त हो गया। यह जीव कुछ समाधान करता नहीं है, फिर उसे अनुभव कैसे होवे?

कहा कि केवल चिन्त शुध्दि के लिए सत्कर्म करना है। सत्कर्म करने के लिए कोई विशेष मुहूर्त की आवश्यकता नहीं है। इसी क्षण से आरंभ करें सत्कर्मों का। बातों में चर्चा विचारणा में समय का व्यय न करों। विचार में समय गांवाओगे तो आचारः के लिए समय कहां से लगाओगे? आज तक रुपये पैसों की पीछे भागते रहे। अब जरा भगवान के पीछे भी तो दौड़ो।

आज की अशांति का यही कारण है की जीवने ईश्वर को भुला दिया हैं । मनुष्य राजा बने या स्वर्ग का देव, राजा हो या रंक, विद्वान हो या मूर्ख, उसके लिए शांति नहीं है। जीव ईश्वर से जा मिलेगा तभी शांति प्राप्त होगी। थोड़ी सी साधना कर लेने पर मनुष्य को सिद्धि मिलती है, उसके वचन सच होने लगते हैं। सिद्धि के साथ प्रसिद्धि और लोगों की भीड़ आती है। ऐसा होने पर गर्व अभिमान आ जाता है। और अभिमान लाता है पतन।साधुओं को कई बार उनके शिष्य चापलूसी करके बिगाड़ देते हैं। मेरापन आते ही साधना उपेक्षित होती है। साधु सोचता है, हां सेवा तो होती रहेगी फुर्सत के समय। अभी तो मैं सेवकों की लाभ ले लूं मैं सिद्ध हूं सो मन से सेवा कर लूंगा। यह बात ठीक नहीं है। 

ईश्वर के दर्शन हो जाने के बाद जपसेवा ध्यान साधनों का त्याग ना करना। अन्यथा माया आ घेरेगी। कुछ लोग सध्यकी प्राप्ति हो जाने पर साधन की उपेक्षा करने लगते हैं। यह ठीक नहीं है। साधन में शिथिलता आयेगी तो मन गड़बड़ करेगा। बलवान हाथी के लिए भी अंकुश जरूरी है। मन भी वैसा ही है। उसे अंकुश में रखने का साधन है भजन।


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