नजरियाःन्याय व्यवस्था की मुक्त समीक्षा होनी चाहिए

 


० राजीव कुमार ओझा (पत्रकार-लेखक)

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तंभों मे सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है न्याय पालिका। लोकतंत्र और लोक की रक्षा की अहम संवैधानिक जिम्मेदारी जिस न्यायपालिका पर है। वह खुद कार्यपालिका, विधायिका के नाकारापन और मुकदमों के बोझ तले हांफ रही है। पेशेवर मुकदमेबाजों की फौज इस बोझ में इजाफा करती है, जिनपर लगाम लगाने की जरूरत न्यायपालिका महसूस नहीं करती। न्याय की उम्मीद लिये तारीख दर तारीख अदालतों का चक्कर काटते वादकारी हमारी न्याय व्यवस्था की तल्ख हकीकत है। हमारी न्याय व्यवस्था आम आदमी की उम्मीदों के अनुसार न्याय दे पाने में असफल रही है यह भी एक तल्ख हकीकत है। 

विलंबित न्याय से वादकारियों को निजात मिले इस संदर्भ मे ज्यूडिशियल रिफार्म की भारतीय विधि आयोग, विभिन्न संसदीय समितियों, सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठों, विभिन्न विधिक संगठनों की अधिकांश  संस्तुतियों पर अमल नहीं किया गया। न्याय तंत्र के प्रति सरकारों का रवैया हैरान करता है। 10वीं पंचवर्षीय योजना में देश के कुल योजना व्यय का मात्र 0.078 प्रतिशत बजट ही आवंटित किया गया था। औसतन न्याय तंत्र पर यह देश जीडीपी का 0.2 प्रतिशत बजट आवंटित करता रहा है।यही वजह है कि हिन्दुस्तान में सस्ते, सुगम और शीघ्र न्याय की संविधान निर्माताओं की परिकल्पना एक छलावा सिद्ध हुई है।  

2002 में पी. रामचंद्र बनाम कर्नाटक सरकार की चर्चा प्रासंगिक है। जिसमें कहा गया था कि शीघ्र न्याय प्रदान करना विशेषतः आपराधिक मामलों में राज्य का संवैधानिक दायित्व है। इस दायित्व के निर्वहन का जमीनी सच यह है कि पुलवामा आतंकी हमले में संदिग्ध भूमिका वाला जम्मू कश्मीर का डिप्टी एसपी देवेन्द्र सिंह आतंकवादियों के साथ पकड़ा जाता है। उसकी जमानत इस आधार पर हो जाती है कि स्वयंभू देशभक्त, स्वयंभू राष्ट्रवादी सरकार ने इस देशद्रोही डिप्टी एसपी के खिलाफ न्यायालय मे चार्जशीट ही दाखिल नहीं की थी। न्यायाधीश देशद्रोह के इस गंभीर मामले में अभियोजन पक्ष से चार्जशीट दाखिल न करने की मक्कारी की कैफियत तलब नहीं करते, देशद्रोही को जमानत पर रिहा करने का फैसला सुना देते हैं।

मोदी मेड न्यू इंडिया में न्यायपालिका की विश्वसनीयता दिन पर दिन घटती जा रही है। मोदी काल मे न्यायपालिका पर सियासी दबाव, हस्तक्षेप का आलम यह है कि सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों को प्रेस कांफ्रेंस कर देशवासियों से अपील करनी पड़ी कि लोकतंत्र खतरे में है इसे बचा लो।  हम न्यायपालिका के उस दौर से गुजर रहे हैं जो जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत के मामले में न्याय नहीं कर पाती है। 

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट से जो आंकड़े उजागर हुए हैं वह चौंकाने वाले हैं। याद कीजिये जस्टिस ठाकुर सेवानिवृत्ति के बाद अपने विदाई भाषण में  न्यायपालिका की स्थिति का जिक्र करते हुए रो पड़े थे। उन्होंने न्यायाधीशों के रिक्त पदों का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अपील की थी कि शीर्ष प्राथमिकता पर रिक्त पदों पर नियुक्ति की जानी चाहिये। नरेन्द्र मोदी के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष विवेक देवराय ने यह बात स्वीकार की थी कि न्यायपालिका में 25 प्रतिशत सीट रिक्त हैं। 120वें विधि आयोग की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि आबादी और न्यायाधीशों की संख्या के मामले में भारत वैश्विक इंडेक्स मे नीचे के पायदान पर खड़े देशों में शामिल है। इस रिपोर्ट में प्रति दस लाख आबादी पर न्यूनतम 50 न्याधीशों की व्यवस्था की संस्तुति की गयी थी।  

द वायर की एक रिपोर्ट बताती है कि सितंबर 2019 में न्यायाधीशों के 414 पद रिक्त थे। न्यायालयों मे लंबित मुकदमों की संख्या का धौलागिर न्यायपालिका के कंधों पर है। जहां अधीनस्थ अदालतों में तकरीबन 4 करोड़, उच्च न्यायालयों में 44 लाख से ज्यादा, सर्वोच्च न्यायालय में 587000 मुकदमें लंबित हैं। अगस्त 2020 की एक मीडिया रिपोर्ट में लंबित मुकदमों का चौंकाने बाला आंकड़ा प्रकाशित किया गया जो बताता है कि 150 मुकदमें 60 साल से, 660000 मुकदमें 30 साल से, 6000000 मुकदमें 5 साल से लंबित हैं। लंबित मुकदमों का पहाड़ दिन पर दिन बढ़ रहा है। 

लंबित मुकदमों के इस पहाड़ से निजात पाने के लिये फौरन से पेश्तर  युद्ध स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है। रिक्तियों और लंबित मुकदमों के बोझ तले दबी न्यायपालिका की कार्यपद्धति भी विवादों के घेरे में रही है। प्रशांत भूषण प्रकरण इसका हालिया उदाहरण है। इस प्रकरण ने न्यायाधीशों के स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति पर सवालिया निशान खड़े किये।                                                                                                                                                                                                                                                                                                  संभवतया यह पहला अवसर था, जब सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठतम अधिवक्ता के ट्विट का संज्ञान लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक हास्यास्पद स्थिति पैदा की और उसे बैकफुट पर जाना पड़ा। इस मामले में कोर्ट ने यह सवाल देश और न्यायपालिका के समक्ष खड़ा किया कि न्यायपालिका और न्यायाधीशों की कार्यप्रणाली की मुक्त समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिये? अवमानना के खौफ से न्यायपालिका को समीक्षा के दायरे से छूट क्यों दी जानी चाहिये?

बहरहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट से आए दो ताजा तरीन फैसले न्यायपालिका और न्याय दोनों को कटघरे मे खड़ा करते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक फैसले मे यह कहा है कि उ.प्र.में गो हत्या निरोधक कानून का दुरुपयोग निर्दोष लोगों के खिलाफ हो रहा है। बिना लैब परीक्षण के किसी भी मांस को गोमांस बता कर लोगों को जेल भेजा जा रहा है। उच्च न्यायालय ने न तो प्रदेश सरकार को कानून के दुरुपयोग के लिये कोई दिशा निर्देश देने की जरूरत समझी न ही कानून का दुरुपयोग करने वाले पुलिस तथा तथाकथित गौ रक्षकों के लिये नजीर बने ऐसा दण्ड, अर्थदंड देने की जरूरत समझी।

गाजीपुर के एक हास्पिटल के ध्वस्तीकरण के मामले में हाईकोर्ट ने यथास्थिति कायम रखने का आदेश तो पारित किया लेकिन ध्वस्तीकरण नोटिस के खिलाफ हास्पिटल प्रबंधन की रिवीजन पेटीशन के लंबित रहते हुए ध्वस्तीकरण की असंवैधानिक करतूत मे शामिल प्रशासनिक अमले के खिलाफ किसी कार्यवाही की जरूरत नहीं समझी।

यह दोनोंं मामले मोदी मेड न्यू इंडिया में न्यायपालिका की दृष्टि और दृष्टिकोण में आये परिवर्तन को रेखांकित करते हैं। हमें यह बताते हैं कि न्यायपालिका कितने दबाब में है? समय की मांग है कि न्यायपालिका आत्मानुशासन, आत्म मंथन की पहल करें और मुक्त समीक्षा की पहल वह स्वयं करे। अवाम को सस्ता, सुगम शीघ्र न्याय सरकार आबादी के अनुपात में न्यायाधीशों की व्यवस्था करे साथ ही साथ न्याय तंत्र के ढांचागत सुधार के ठोस उपाय करें।

नोटः यह लेखक के अपने विचार हैं। 




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