ऐसा दरबार जहां आने के बाद नाचता है भूत!, इस बार अहरौरा के इस प्रसिद्ध मेले का नहीं होगा आयोजन

कोरोना संकटकाल में भेंट चढ़ा बेचूबीर मेला, पांच लाख से अधिक लोग होते है शामिल



भारत भूषण त्रिपाठी

इमिलियाचट्टी/मीरजापुर। शिव के आराधना में लीन एक भक्त की समाधि स्थल, जहां आने के बाद भूत नाचने लगते है। यह महज कथन ही बल्कि हकीकत है। तकनीक और विज्ञान की दुनिया में भले ही मंगल ग्रह पर जाने का ख्वाब देशवासी देख रहे हो, लेकिन अंधविश्वास भी लोगों को पीछा छोड़ने को कतई तैयार नही है। 

अहरौरा में स्थित बेचूबीर धाम को लेकर बहुत से कहानियां है, लेकिन हकीकत में क्या हुआ उससे मिलता कोई प्रमाण मौजूद नही है। अहरौरा से लगभग 12 किलोमीटर दूर बरही गांव में स्थित इस ऐतिहसिक स्थल को लेकर कहा जाता है कि आज से करीब तीन सौ वर्ष पहले बरही गांव में घनघोर जंगल हुआ करता था। इस जंगल में लोग पशु चराने जाया करते थे। ऐसी मान्यता है कि पटीहटा गांव के निवासी बेचू यादव जो कि शिव भक्त थे, वो एक दिन बेचू यादव अपने जानवरों को चराने के लिए बरही जंगल गये हुए थे, जहां उनके ऊपर बाघ ने हमला कर दिया। 

इस दौरान बाघ से काफी समय तक मुकाबला के बाद पहले दिन बाघ वापस चला गया। अगले दिन भी बाघ ने बेचू यादव के ऊपर हमला किया, लेकिन फिर काफी देर मुकाबला के बाद बाघ थक हार कर वापस चला गया, लेकिन तीसरे दिन ऐसा नही हुआ। तीसरे दिन बाघ के हमले में बेचू ने प्राण त्याग दिया। बेचू के मौत की खबर के बाद बेचू की पत्नी बारह दिन के बच्चे के साथ मौके पर जाकर सती हो गईं। ऐसे में उन्हें बरहिया माई के नाम से जाना जाता है। कुछ दिन बाद जंगल में बने समाधि स्थल पर जाने से लाभ होने लगा, जिसके बाद उक्त स्थान बेचूबीर के नाम से विख्यात हो गया। 

मान्यता है कि जो भी अपना मुराद लेकर इस धाम में आता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है। बेचूबीर धाम को लेकर कहा जाता है कि यहां आने से संतान की प्राप्ति होती है, यहीं नही तथाकथित भूत-प्रेत, डायन, चुडै़ल से भी मुक्ति मिलती है। बेचूबीर धाम में यह मेला कार्तिक की नवमी को आयोजित होता है, जहां एकादशी तक चलता है। एकादशी की रात में मनरा बजने के बाद मेले का समापन का हो जाता है। इस तीन दिवसीय मेला को भूतों का मेला भी कहा जाता है। 

विज्ञान को चुनाैती देता है बेचूबीर मेला

अहरौरा का बेचूबीर धाम जो विज्ञान और चिकित्सा के लिए चुनोती है। अब इसे अंधविश्वास कहे या फिर आस्था लेकिन लोगों का मानना है कि यहां आने से तथाकथित भूत, प्रेत, चुरेल से मुक्ति मिलती है। यहीं नही गंभीर बीमारी मुक्ति या जिनको संतान नही है, उन्हे संतान की भी प्राप्ति होती है। तीन दिवसीय इस मेले में बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, सहित उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, चन्दौली, बनारस, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर, इलाहाबाद सहित अन्य प्रांतों से लोग आते है। इस बार कोरोना को देखते हुए बेचूवीर बाबा आयोजक ट्रस्ट ने फैसला लिया गया है कि इस वर्ष मेले का आयोजन नही किया जाएगा। पुजारी बृजभूषण यादव ने भक्तों से अपील किया कि अपने घरों पर ही बेचूवीर की पूजा अर्चना करेंगे।


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