भटकते जीवात्मा को लक्ष्य की राह प्रशस्त करता है सतसंगः प्रपन्न जी

पांच दिवसीय लक्ष्मी नारायण महायज्ञ में बही भक्ति रस गंगा


प्यारेलाल यादव

चिरईगांव। बर्थराकला (गोपालापुर) में पांच दिवसीय लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के चौथे दिन शुक्रवार को भी वैदिक मंत्रोच्चार से पूरे क्षेत्र में भक्ति रस की गंगा बहती रही। इस दौरान अपनी वाणी की अमृत वर्षा करते हुए परम् सन्त जीयर प्रपन्न जी महाराज ने कहा कि जीवन में भौतिक पदार्थ का सुख व्यक्ति क्षणिक पा सकता है। परम् सुख जगतपति श्री हरि की भक्ति और शरणागत होने में ही है। 

उन्होंने कहा कि लक्ष्य से विमुख जीव भटकने लगता है। उसे पुनः लक्ष्य प्राप्ति के दान पुण्य के साथ साथ सतसंग करना चाहिए। कहा कि जहां भक्त और भक्ति होती है, वहीं भगवान का निवास करते हैं। भगवान का भक्त उत्तरायण में मरे या दक्षिणायन में कोई फर्क नही पड़ता है। यदि हमारा लक्ष्य ठीक नहीं है तो उत्तरायण में मरकर भी फल को प्राप्त नहीं करेंगे। और यदि हमारा उदित लक्ष्य ठीक होगा तो हम दक्षिणायन में मरकर भी उत्तरायण का जो सुकृत होता है वह फल प्राप्त करेंगे। 



बताया कि भागवत कथा में भगवान ने कहा है कि यदि मेरा भक्त है, जिंदगी भर हमारा भजन किया है और मरते समय हमको उसने याद नही किया तो भी मैं अपने भक्तों को याद करता हूं। वह अपनी परम गति को प्राप्त करता है। वात, पित्त, कफ यह तीनों घेर ले और अपने आप में जो-जो व्यक्ति मरते समय जिस-जिस भावना से मरता है, मरने के बाद उसी गति को प्राप्त होता है।


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