आखिर कब-तक दम तोड़ती रहेंगी बेटियां....


हर रोज ना जाने कितनी हाथरस और निर्भया जिन्दगी से हार जाती हैं....कब तक इतने बड़े लोकतंत्र में ऐसे शर्मनाक अपराध होते रहेंगे! क्या ऐसे घिनौने, क्रूर अपराध हमारे लोकतंत्र पर दाग नही है?....ना जाने किस मिट्टी के बने होते वो जो ऐसे अपराध करते। कभी -कभी तो लगता ही नही की ऐसे लोग इंसान होते ही नही हैं। कितनी निर्भया और???? 


कभी हमनें विचार किया है क्या आखिर ऐसे लोगों के पास इतनी गर्मी आती कहाँ से है....कैसे वो इतने बेरहम, इतने दरिंदे होते....कैसे भटके होते है इतने की उन्हें कोई डर ही नही होता की अंजाम क्या होगा। जिम्मेदार तो हम सब है स्त्री-पुरुष, कानून, सरकार सब है जिम्मेदार।


हम लड़काें को पैदाइश से ही ऐसी परवरिश ही क्यों दे कि वो खुद को महान समझे, वो जो चाहे कर सकते ऐसी दिशा ही क्यों दिखानी और बेटियों को चुप रहना, दब के रहना, डर के रहना ऐसी परवरिश क्यों दे? क्यों न हम शुरुआत ही बेहतर करें...पौधे की अच्छी सिंचाई करें ताकि वो अच्छा पेड़ बन के उगे।



(Ayushi Tiwari)


निर्भया जैसे ना जाने कितनी घटनाओं ने दिल में घाव कर रखा है। अभी एक घाव भरता नही की दूसरा प्रहार हो जाता है अभी हाथरस की घटना से खून खौल रहा जिसपर बीती होगी कितनी तड़पी होगी वो बिटियां... क्यों नही ऐसे दानवों को जिन्दा मार दिया जाता है क्यों नही ऐसी व्यवस्था बना दी जाती, जिससे कोई ऐसी हरकत के बारे में सोचे भी तो रूह कांप जाएं...हर दिन ना जाते ऐसे ही कितनी बेटियां अपनी जिन्दगी गवां देती है...स्टेट्स लगते, शोर होता लेकिन फिर शांति......आखिर क्यों???? आज अगर इस दौर में भी बेटियां कहीं कहीं पीछे है तो शायद ऐसे ही डर की वजह से ...कब खत्म होगा ये डर ....सरकार से भीख मांगती है अब बेटियां की वो करें कुछ ऐसा जो कभी कहीं न हुआ हो रच दे एक इतिहास जिसकी गूँज कभी शांत न हो और बना दे ऐसा माहौल जहाँ बेटियां बेफिक्र हो...सुरक्षित हों।
’बेटियों की आवाज’


आयुषी तिवारी
शिक्षार्थी, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी


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