बढ़ते मातृ मृत्यु दर को रोकने हेतु गर्भ समापन कानून की जानकारी होना अति आवश्यक-नीतू सिंह

हर साल असुरक्षित गर्भ समापन के कारण होती है आठ प्रतिशत महिलाओं की मौत


ग्राम्या संस्थान ने डुमरिया गांव में किया परिचर्चा का आयोजन



जनसंदेश न्यूज़
चंदौली। ग्राम्या संस्थान द्वारा चिकित्सकीय गर्भ समापन कानून को लेकर चलाए जा रहे दस दिवसीय अभियान के अंतर्गत शुक्रवार को क्षेत्र के डुमरिया गांव में लोगों के साथ परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा के दौरान मातृ मृत्यु दर, उसके कारणों व उपायों के साथ चिकित्सकीय व्यवस्थाओं पर विचार-विमर्श हुआ तथा मातृ मृत्यु दर को रोकने के लिए बनाये गये कानून को लेकर भी लोगों को जागरूक किया गया। 


इस मौके पर ग्राम्या संस्थान की नीतू सिंह ने बताया कि मातृ मृत्यु दर में बढ़ोतरी को रोकने व असुरक्षित गर्भ समापन के प्रतिकूल परिणाम को रोकने के प्रयासों के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा 1971 में गर्भ समापन कानून लाया गया। चिकित्सकीय गर्भ समापन कानून यानी मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी अधिनियम 1971 इस कानून के अंतर्गत महिलाएं कुछ विशेष परिस्थितियों में सरकारी अस्पताल में या सरकार की ओर से अधिकृत किसी भी चिकित्सा केंद्र में अधिकृत व प्रशिक्षित डॉक्टर द्वारा गर्भ समापन करा सकती हैं। 



न्होंने कहा कि सामान्यतया उत्तर प्रदेश में करीब पचास लाख महिलाएं गर्भवती होती हैं, जिसमें करीब छः लाख गर्भ समापन कराती हैं। जिसमें स्वतः गर्भपात भी शामिल है। कुल मातृ मृत्यु दर में से करीब 8 प्रतिशत महिलाओं की मृत्यु असुरक्षित गर्भसमापन के कारण से हो जाती है। ऐसे में इस कानून के बारे में गांव के लोगों को जागरूक करना बहुत जरूरी है। इस दौरान मदन मोहन, रिंक,ू रामविलास, भगवानी निर्मला अनीता, सविता इत्यादि लोग शामिल रहे। 


 


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