किसान बढ़ाएं आमदनी : लो टनल तकनीक से तैयार करें बेहन, बेमौसम की सब्जियों की अच्छी पैदावार के लिए यह टेक्नीक है लाभकारी

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में इस तकनीक का लगातार बढ़ रहा चलन



सुरोजीत चैटर्जी


वाराणसी। वर्षाकाल में बरसाती टमाटर आदि सब्जियों का बेहन तैयार करना है तो ‘लो टनल’ तकनीक अपनाना लाभकारी है। बेमौसम की सब्जियों के उत्पादन के लिए विभिन्न तकनीकों में यह तकनीक बहुत उपयोगी है। बीज रोपने के बाद क्यारियों के ऊपर प्लास्टिक से इसे तैयार किया जाता है। जिससे बेहन के बाद फसल भी जल्दी तैयार होगी। अगैती या बेमौसम की सब्जियों की खेती में इस विधि से बेहन तैयार का सबसे अधिक लाभ यह है कि किसान को मार्केट में अपनी उपज का अधिक मूल्य मिलता है।


लो टनल तकनीक के चलते फसल में रोग और कीट लगने की आशंका कम रहती है। वर्तमान सीजन में तापमान के ऊतार-चढ़ाव को देखते हुए सब्जियों का बेहन तैयार करने के लिए कृषि विशेषज्ञ लो टनल तकनीक अपनाने की सलाह देते हैं। कारण, यह विधि फसल को कम टेंपरेचर से होने वाली क्षति से बचाता है। विशेषकर उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में बेमौसम के सब्जी उत्पादन में लोक टनल तकनीक लाभकारी है।


सर्दियों में जहां रात का तापमान काफी गिर जाता है वहीं, वर्तमान सीजन में भी तापपान का उतार-चढ़ाव होता रहता है। इस तकनीक के माध्यम से बेमौसम की सब्जियां उगाने के लिए बेहन तैयार करने के लिए क्यारियों के ऊपर प्लास्टिक की चादर लंबाई में किसी छोटी गलीनुमा या सुरंगनुमा आकार में ढक दी जाती है। इसके लिए सबसे पहले क्यारियों के बीच पानी की ड्रिप लाइन बिछा देते हैं।


क्यारी के ऊपर जंगरोधी लोहे के तार या पतले व्यास के पाइप मोड़कर घेरा बनाना चाहिए। इसके दोनों सिरों की दूरि और बीच के हिस्से की ऊंचाई 50 से 60 सेमी रहे। जबकि तारों के बीच की दूरि डेढ़ से दो मीटर हो। अगले क्रम में पौधों को क्यारियों में रोपकर अपराह्न 20 से 30 माइक्रोन मोटी, दो मीटर चौड़ी पारदर्शी प्लास्टिक चादर ढक देते हैं। उसके बाद प्लास्टिक की लंबाई वाले दोनों छोर को मिट्टी में दबा देना चाहिए।


इस प्रकार बेहन पर प्लास्टिक की कम ऊंचाई वाली एक छोटी सुरंग बन जाती है। तापमान बहुत अधिक गिरने की स्थिति में उस प्लास्टिक में ऊपर से नीचे की ओर कई छेद कर देते हैं। तापमान क्रमश: बढ़ने पर प्लास्टिक हटाकर नेट डाल देना चाहिए ताकि बेहन को हवा मिलती रहे। दूसरी ओर, यदि अत्यधिक बरसात हो रही हो तो नेट के ऊपर से ही दोबारा प्लास्टिक लगा देना चाहिए। उद्यान निरीक्षक ज्योति कुमार सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि लो टनल तकनीक से बेहन तैयार करने से पहले बेल वाली सब्जियों की पौध का संरक्षित क्षेत्र भी तैयार करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि लो टनल तकनीक में किसान उस सुरंग में चल-फिर नहीं सकता। जबकि  दूसरी तकनीक ‘वॉकिंग टनल’ में किसान आराम से चल-फिरकर खेती कर सकता है।


करें मचान आधारित खेती


- बारिश के इस मौसम में अधिक नमी और लगातार बादल बने रहने की स्थित में सब्जियों पर फफूंदनाशी दवाओं का उचित मात्रा में छिड़काव करना चहिए। जिला उद्यान अधिकारी संदीप कुमार गुप्त ने यह सलाह देते हुए यह सुझाव भी दिया है कि खरीफ सीजन में टमाटर और कद्दूवर्गीय सब्जियों की खेती मचान आधारित प्रणाली से करना उपयुक्त होता है। इससे फसल की गुणवत्ता अच्छी होती है। वहीं, यह मौसम अमरूद, केला, लीची, पपीता और आम के बाग लगाने का भी है। बागवानी मिशन के तहत बाग लगाने पर शासन से अनुदान मिलता है।


 


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