लोहता का ताना-बाना लील गया कोरोना, बीमार हो गया बनारसी साड़ियों का मरकज, मंडी में है सिर्फ खौफ और खामोशी
संक्रमित व्यक्ति के घर के आसपास के 42 मकानों को किया गया है सील
कोरोना को लेकर जागरुकता का असर कहें या फिर डर, लोग घरों में दुबके
सड़कों के साथ गलियों में भी अजब सी पसरी है खामोशी, निगाहों में संकट
विजय विनीत के साथ जितेंद्र श्रीवास्तव
वाराणसी। लोहता बाजार में सन्नाटा है। सड़क पर कर्फ्यू जैसे हालात हैं। लेकिन गलियों में हलचल है। चहल-पहल है। कुछ वैसी ही चहल-पहल जैसी आम दिनों में होती रही है। सोशल डिस्टेंसिंग की तो बात ही न कीजिए। चेहरे पर न मास्क है और न ही गमछा। लोहता बनारस का वही कस्बा है जहां कोरोना से संक्रमित एक व्यक्ति पाया गया है। यहां पुलिस की तगड़ी चौकसी है। लेकिन इस कस्बे के युवक पुलिस से हर रोज आंख-मिचौली खेल रहे हैं। पुलिस पहुंचती है तो हड़कंप और हंगामा मच जाता है।
हॉट स्पाट बने लोहता का ये नजारा एक दिन का नहीं, रोज का है। इस कस्बे के मोहल्ला अलावल में कोरोना संक्रिमत व्यक्ति के घर के अलावा आसपास के 42 मकानों को सील किया गया है। इन मकानों के चारों ओर पांच जगहों पर बैरिकेडिंग की गई है। मौके पर बड़ी संख्या में जवान तैनात हैं। जिस इलाके को सील किया गया है उसे छोड़कर बाकी लोहता में लाक डाउन एक तरह से मजाक बनकर रह गया है। इसके लिए पुलिस नहीं, स्थानीय लोग ही जिम्मेदार हैं। बीमारी को लेकर लोगों में जागरुकता नहीं है। कहीं क्रिकेट हो रहा है तो कहीं जुआ। या फिर लूडो पर बाजियां लग रही हैं।
लोहता बनारस का वो इलाका है जो बनारसी साड़ियों की मंडी के रूप में मशहूर रहा है। यहां दुनिया भर से कारोबारी साड़ियां खरीदने पहुंचते हैं। हर तरह की साड़िया बनती हैं यहां। अमीरों के लिए भी और गरीबों के लिए भी। बनारसी साड़ियों की मंडी को कोरोना की नजर लग गई है। धंधा जाम हो गया है। न कोई खरीदार और न ही साड़ियों की बुनाई। सब कुछ ठप सा है। लाकडाउन ने बुनकर नियामतुल्लाह की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। वो कहते हैं, - क्या करें। कहां से आटा-चावल लाएं। जब रोज कमाते थे तब परिजनों का भर पाता था पेट। अब कैसे खींचे जिंदगी की गाड़ी? राशन कार्ड भी नहीं है। किसके यहां लगाएं गुहार?
लोहता कस्बे के इस्लामपुर मुहल्ले में हमें मिले राजेश सेठ। इनकी ज्वेलर्स की दुकान है। वो किसी तरह बात करने के लिए राजी हुए। बोले, -जब खाने को लाले पड़े हैं तो भला जेवर कौन खरीदेगा? यहां हर शख्स खौफजदा है। इसे चाहे कोरोना को लेकर जागरूकता का असर कहें या फिर दिलो-दिमाग में बैठा डर। हाल यह है कि हर कोई घर में दुबक कर बैठा है। गजब का खौफ है कोराना। सबको डर है कि करोना किसी को डंस न ले। लोहता में वीरानगी दिखती है। इक्का-दुक्का घरों की बालकनी से झांकतीं महिलाएं और बच्चे जब भी किसी वाहन को देखते तो भागते हैं और दुबक जाते हैं। शायद उनके मन में खौफ कुछ ज्यादा ही घर कर गया है। इनके चेहरों की गायब हो चुकी रंगत उनके खाली पेट होने की बात तस्दीक करती है।
अलाउद्दीन कहते हैं, -वो इतना उदास पहले कभी न थे, जितना आज हैं। सिर्फ वो ही नहीं, समूचा लोहता हमेशा गुलजार रहता था। अब कस्बे की रौनक ही गायब है। इनकी खामोशियों में उन छोटे दुकानदारों का दर्द भी छिपा है, जो फुटपाथ पर चाय से लेकर चाट बेचकर किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते थे। कोरोना ने लोहता को इस कदर बीमार कर दिया है कि उसका हाल आईसीयू में पहुंचे मरीज की तरह हो गई है। हालात कब बदलेंगे? कुछ नहीं कहा जा सकता है।