पान की खेती में जी जान से मेहनत कर रहे किसान, फिर भी परेशान! 


.....नही हो पा रहा जीवन यापन


......और न ही छोटे किसानों को मिल रही सरकारी सहायता

जनसंदेश न्यूज़
महराजगंज/जौनपुर। पान की खेती में जी जान से मेहनत करने के बाद भी कमाई न होने से युवाओं का मन ऊब गया है। हाड़ तोड़ मेहनत के बाद भी जीवन यापन नही चल पा रहा है। गर्मी के सितम जारी होते ही पान की सिंचाई में पसीना छूट जाता है। किसी तरह सिंचाई तो हो जा रही है, लेकिन पान की खेती में लगने वाले रोग से किसान को समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिससे पान की खेती घाटे का सौदा प्रतीत हो रहा है।
पान की खेती में पर्याप्त मुनाफा न मिलने से युवाओं का मोह भंग हो रहा है और जीवन यापन करने के लिए शहरों में पलायन करने के लिए मजबूर हैं। पान की खेती से जहां पहले किसानों का पूरा जीवन यापन चलता था। वही अब इस खेती में रोगों के प्रकोप की सुविधाएं न मिलने व तकनीकी जानकारी का आभाव एवं परम्परागत खेती करना ही इस खेती से मोह भंग होना है।
इस तरह होती है खेती
पान की खेती की शुरुआत लता से होती है पहले बरेजा (पान का भीटा) तैयार करने में बांस व सरपत की आवश्यकता होती है। इसके बाद पान की लता की जरूरत पड़ती है। बरेजा (पान का भीटा) तैयार होने के बाद लता लगाया जाता है। शरद ऋतु के बाद लता सूखने लगती है, इसलिए फरवरी व मार्च के महीने में लता बड़ी मुश्किल से मिलती है।
सिंचाई के लिए तालाब, हैंडपंप, कुएं से पानी लेकर घड़े या सुराही में भरकर पान के पत्तांे पर हाथ से फौव्वारा की तरह पत्ती पर पानी डाला जाता है।



वैरायटी-स्थानीय ब्लॉक में पान की मुख्य रुप से दो वैरायटी है। जिसमें देशी साँची व लाल बंगला पान है। इनका प्रमुख बाजार जौनपुर व वाराणसी है।
पान में लगने वाले रोग
गान्धी रोग, उकठा रोग यह रोग पौधों के जड़ों को नीचे से समाप्त कर देता है और पौधा पूरी तरह सूख जाता है।
अनुदान-जिला प्रशासन द्वारा 2014 में चयनित किसानों को उद्यान विभाग प्रोत्साहन राशि दिया गया था। उसके बाद बरेजा (पान का भीटा) का 500 वर्ग मीटर व 1500 वर्ग मीटर निर्धारण करने के बाद कुछ किसानों को अनुदान मिला। बाकि छोटे माप वाले किसान इससे वंचित रह गए।
वर्तमान समय में ब्लॉक के उदयभान पुर, कोल्हुआ, इब्राहिमपुर, मनिकापुर, मस्थरी आदि गांवो में परम्परागत चौरसिया बिरादरी के किसान करते हैं। इस खेती के बारे में पान की खेती करने वाले किसान लालजी चौरसिया ने बताया कि 2014 में शासन द्वारा अनुदान मिला था। उसके बाद बरेजा (पान का भीटा) के ऊपर जुगाड़ वालों का मानक 500 वर्ग मीटर व 1500 वर्ग मीटर माप सिर्फ कागज पर दिखाकर अनुदान राशि ले लिए गए और कम माप वाले किसान कमर तोड़ मेहनत कर रहे हैं।


उनका कोई अनुदान सरकार की तरफ से नही मिला। वही पान का भीटा करने वाले किसान बलराम, जगदीश, कमलेश, लालचन्द, दीपक, महेंद्र, विनोद चौरसिया, राकेश आदि ने बताया कि पान की खेती अब घाटे का सौदा हो चुकी है। पान में लगने वाले रोग तकनीकी जानकारी शासन स्तर से न मिलने से युवा नौजवान शहरों के लिए पलायन पर मजबूर हैं। हाड़ तोड़ मेहनत के बाद  भी पान की खेती में मुनाफा न मिलने से किसान पान की खेती करने से कतरा रहे हैं।


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