सुरेशचन्द्र शुक्ल: हिन्दी साहित्य का एक ऐसा नाम, जो नार्वे से कर रहे हैं हिन्दी की सेवा


6 नार्वेजीय साहित्य का किया है हिन्दी अनुवाद


एक दर्जन से अधिक सम्मानों से हो चुके है सम्मानित 

जनसंदेश न्यूज़
वाराणसी। दुनिया के हर एक नागरिक का अधिकार है कि वह अपनी मातृभाषा को अच्छे से जाने तथा उसका सम्मान करें, तब ही वह दूसरी भाषाओं का भी सम्मान कर पाएगा। यह कहना है हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल का। श्री शुक्ल ने गुरूवार को जनसंदेश टाइम्स के साथ खास बातचीत की।
10 फरवरी 1954 को यूपी के लखनऊ में जन्मे श्री शुक्ल आगामी 10 फरवरी को 66वें वर्ष में प्रवेश कर रहे है। पिछले 40 वर्षों से नार्वे में रहकर हिन्दी की सेवा कर रहे श्री शुक्ल ने बताया कि नार्वे के हिन्दी स्कूल नार्वे में वें बच्चों को हिन्दी साहित्य पढ़ाते है। जहां से हिन्दी और नार्वेजी भाषा में प्रकाशित द्विमासिक पत्रिका ‘स्पाइल’ का सम्पादन भी करते है। द्विमासिक-द्विभाषिक इस पत्रिका का प्रकाशन 1988 से शुरू हुआ था। 
हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में इनके योगदान की महत्ता को इस बात से समझा जा सकता है कि इन्होंने हिन्दी के 9 काव्य संग्रह, 3 कहानी संग्रह, 5 नाटक व एक उपान्यास लिखा है। इसके साथ ही 6 नार्वेजीय साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी किया है। इनकी कहानियों पर 6 लघु फिल्मों का भी निर्माण हुआ है। जिसका निर्देशन आनंद शर्मा ने किया है।  
करीब एक दर्जन पुरस्कारों से सम्मानित श्री शुक्ल का कहना है कि जो व्यक्ति अपनी मातृभाषा को सीखता है, वह दूसरी भाषाओं को भी उतना जल्द ही सीखने में सक्षम होता है, क्योंकि मातृभाषा हर व्यक्ति को परिपक्व बनाने का कार्य करती है। 


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